Wednesday, 14 November 2018

सऊदी का ये घिनौना चेहरा देख लें दुनिया के मुसलमान !


खुद को मुस्लिम दुनिया का नेता बताने वाले सऊदी अरब की पोल एक बार फिर खुल गई है। अमेरिका से सऊदी अरब की नजदीकियां किसी से छिपी नहीं हैं और इन नजदीकियों की एक वजह सऊदी अरब का ईरान से नफरत भरा रवैया रहा है जो वक्त-वक्त पर खुलकर सामने आया है। ये किसी से छिपा नहीं है कि अमेरिका और ईरान के बीच हमेशा से तल्ख रिश्ते रहे हैं और कुछ ऐसा ही सऊदी अरब और ईरान के बीच रहा है। ऐसा कई बार हुआ जब अपने को मुस्लिम राष्ट्र बताना वाला सऊदी अरब कई बार खुद मुस्लिम देश ईरान की जड़ें काटते हुए बेपर्दा हो चुका है।

हाल में सामने आई अमेरिकी जस्टिस विभाग की रिपोर्ट में पता चला है कि ईरान के परमाणु क़रार के बाद सऊदी अरब ने लॉबीइंग के ख़र्च में बहुत ज़्यादा इज़ाफ़ा किया है। साल 2014 में उसने इस मद में छह मिलियन डॉलर ख़र्च किए थे जबकि उसका यही ख़र्च साल 2015 में लगभग 15 मिलियन डॉलर तक पहुंच गया था।

दैनिक क्रिश्चियन साइंस मॉनीटर की साल 2016 की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ साल 2015 में सऊदी अरब ने वॉशिंगटन में लॉबीइंग करने वालों को जो रक़म दी उसका ज्यादातर हिस्सा सिर्फ एक लक्ष्य पर ख़र्च किया गया और वह लक्ष्य था ईरान के खिलाफ सऊदी अरब के विचारों का प्रचार-प्रसार। दस्तावेज़ से ये भी पता चलता है कि एमएसएल ग्रुप नाम की एक कंपनी ने परमाणु क़रार के बाद तीन साल में सऊदी अरब से छह मिलियन डॉलर हासिल किया और इसके बदले क्षेत्र में ईरान की गतिविधियों के खिलाफ सामग्री तैयार करके इसे नियमित रूप से अमरीकी नेताओं को बांटा।

एक हफ्ते पहले ही अमेरिका ने ईरान पर फिर से कड़े प्रतिबंध लागू किए हैं।  ईरान के साथ परमाणु समझौते में शामिल बाकी पक्ष अमेरिका के प्रतिबंधों का विरोध कर रहे हैं। विरोध करने वाले ये देश ब्रिटेन, फ्रांस, चीन और रूस हैं। संयुक्त राष्ट्र निरीक्षकों का भी मानना है कि ईरान समझौते की शर्तों पर बना हुआ है। इस मुद्दे पर सऊदी अरब अमेरिका का एकमात्र समर्थक देश है। अमेरिका ने 2015 में ईरान से प्रतिबंध हटाए थे लेकिन राष्ट्रपति ट्रंप ने दोबारा प्रतिबंध लागू कर दिए हैं। अमेरिका ने ईरान पर लगाए गए प्रतिबंधों से 8 देशों को अस्थाई छूट दी है। इन देशों में भारत भी शामिल है। भारत के अलावा चीन, दक्षिण कोरिया, जापान, इटली, ग्रीस, ताइवान और तुर्की को इन प्रतिबंधों से छूट दी गई है। बता दें कि छूट पाने वाले ये 8 देश ईरान के तेल निर्यात का कुल 75 फीसदी खपत करते हैं। 

पिछले करीब 15 सालों में सऊदी अरब और ईरान के बीच दूरियां और बढ़ी हैं। सीरिया में ईरान और रूस ने राष्ट्रपति बशर-अल-असद को समर्थन दिया जिससे सऊदी के समर्थन वाले विद्रोही गुटों को हटाने में कामयाबी मिली।उस वक्त ईरान, सीरिया के साथ खड़ा था जब सीरिया के शहरों से ISIS के आतंकियों को खदेड़ा जा रहा था लेकिन उस समय भी सऊदी अरब का दोहरा चेहरा दुनिया ने देखा था। सऊदी अरब ने आतंकवाद से लड़ने के नाम पर 24 मुस्लिम देशों का एक समूह बनाया था हैरानी की बात ये थी के उस समूह में ईरान का ही नाम नहीं था।
    ईरान और सऊदी अरब की सैन्य शक्ति पर नजर डालें तो ईरान का पलड़ा भारी है। ईरान के पास पांच लाख 63 हज़ार सशस्त्र बल हैं जबकि सऊदी के पास महज दो लाख 51 हज़ार 500  सशस्त्र बल हैंईरान के पास एक हज़ार 513 युद्धक टैंक हैं जबकि सऊदी के पास 900ईरान के पास 6 हज़ार 798 तोपख़ाने हैं जबकि सऊदी के पास महज 761ईरान के पास 336 लड़ाकू विमान हैं, हालांकि ये पुराने हैं और इनकी मरम्मत की ज़रूरत हैसऊदी के पास 338 आधुनिक लड़ाकू विमान हैं।ईरान के पास 194 गश्ती नाव हैं और सऊदी के पास 11 ही हैं। ईरान के पास 21 युद्धपोत हैं जबकि सऊदी के पास एक भी नहीं है।

Thursday, 9 March 2017

आतंकी बेटे का देशभक्त पिता   


किसी बाप के लिए सबसे बुरा वक्त तब होता है जब उसे अपने जवान बेटे को कंधा देना पड़े। लेकिन एक बाप ऐसा भी है जिसे अपने बेटे के मारे जाने का शायद जरा भी अफसोस नहीं है और ना ही उनके चेहरे पर शिकन है। तो आखिर ऐसी क्या वजह है जो एक बाप अपने मरे हुए बेटे का चेहरा तक देखने से इनकार कर रहा है। आखिर एक बाप को ऐसा क्यों कहना पड़ रहा है कि जो देश का नहीं हुआ वो हमारा क्या होगा।एक बाप के मुंह से अपने जवान बेटे के लिए ये अल्फाज किन हालात में निकले होंगे इसका अंदाजा लगाना बहुत मुश्किल नहीं है। देश को उस बूढ़े बाप की सराहना करनी होगी जिसने अपने जवान बेटे के एनकाउंटर में मौत पर शायद सवाल उठाने के बजाय उस हकीकत को समझा जिसने उन लोगों के लिए भी दरवाजे बंद कर दिए जो ऐसे हालात में राजनीति करते हैं।

    लखनऊ एनकाउंटर में ढेर हुए संदिग्ध आतंकी सैफुल्लाह के मारे जाने के बाद वैसा कुछ भी नहीं हुआ जैसा आमतौर पर किसी भी एनकाउंटर के बाद होता रहा है। कई नेताओं ने एनकाउंटर पर सवाल उठाने की कोशिश की लेकिन सैफुल्लाह के पिता मोहम्मद सरताज ने उन सबकी बोलती बंद कर दी जो एनकाउंटर पर सवाल उठाने की कोशिश कर रहे हैं। सरताज ने अपने बेटे सैफुल्लाह का शव लेने, उसे सुपुर्द-ए-खाक करने और उसका मरा मुंह तक देखने से इनकार कर दिया। जाहिर है एक पिता के इस जज्बे और हिम्मत पर किसको नाज नहीं होगा।

   देश के गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने भी जब लोकसभा में बयान दिया तो वो एनकाउंटर में मारे गये संदिग्ध आतंकी सैफुल्लाह के पिता सरताज की तारीफ करना नहीं भूले। राजनाथ ने सदन में कहा कि हमें मोहम्मद सरताज पर नाज है और सदन को भी इसकी सराहना करनी चाहिए,इस पर लोकसभा में सदस्यों ने ताली बजाकर हामी भरी। राजनाथ ने ये भी कहा कि सरताज ने अपनी औलाद को खोया है और ऐसे में सरकार उनके साथ खड़ी है।

बात जब एनकाऊंटर की हो रही है तो एक और एनकाऊंटर का जिक्र करना यहां जरूरी हो जाता है। 2008 में हुए बहुचर्चित बटला हाऊस एनकाउंटर के बाद देश में क्या हालात हुए थे ये भी किसी से छिपा नहीं है। आज भी वक्त-वक्त पर बटला एनकाऊंटर का जिन्न निकल कर हमारे सामने आता रहता है। बटला एनकाउंटर के बाद जिंदा पकड़े गये दिल्ली बम ब्लास्ट के कुछ आरोपी आज भी जेल में बंद हैं। उनका परिवार आज भी कानूनी जंग लड़ रहा है।जेल में बंद ऐसे ही आरोपियों के परिवारों से जब मैंने बात की थी तो उन्होंने अपने बेटों को पीड़ित बताते हुए बटला एनकाउंटर और पूरे सिस्टम पर ही सवाल उठाए दिए थे। हालांकि इसमें भी कोई शक नहीं कि देश में कई एनकाउंटर फर्जी साबित हो चुके हैं। आतंकी गतिविधियों में शामिल होने या फिर उसे अंजाम देने के आरोप में जेल में बंद कई नौजवान सालों बाद बाइज्जत बरी होकर जेल से वापस भी आए हैं। सवाल उठाने वाले लखनऊ एनकाउंटर पर भी सवाल उठा रहे हैं और शायद उठाते रहेंगे लेकिन एक बाप जिसका जवान बेटा मारा जा चुका है उसे ये कहने में कोई झिझक नहीं कि जो देश का न हुआ वो मेरा क्या होगा ? सवाल कई हो सकते हैं उनके जवाब तलाशना हम सबका काम है। क्या सरताज को मालूम था कि उनका बेट सैफुल्लाह किसी आतंकी संगठन से प्रभावित है ? क्या वो जानते थे कि इसका अंजाम यही होना है ? क्या वो अपने बेटे को इसका अंजाम बता चुके थे या फिर इसकी नौबत आती उससे पहले ही सैफुल्लाह का ये हश्र हो गया। बात जो भी हो लेकिन एक बाप का ऐसे हालात में अपने को पीड़ित साबित करने के बजाय बेटे की गलतियों का अहसास होना ऐसे लोगों पर बहुत बड़ा तमाचा है जो ऐसे मामलों में हमेशा हमारे सिस्टम और ऐसे एनकाउंटर पर सवाल उठाते हैं।

   सैफुल्लाह के पिता सरताज ने उन लोगों के लिए भी एक नजीर पेश की है जो आतंक को एक खास मजहब से जोड़ने की कोशिश करते रहे हैं, जो सच का सामना करने के बजाय सियासी रोटियां सेकने से बाज नहीं आते। जो टोपाई लगाए और दाढ़ी रखने वाले हर शख्स को शक की निगाह से देखते हैं। सरताज ने कहा तो जो देश का नहीं हुआ वो हमारा क्या होगा ऐसे में कोई सवाल की गुंजाईश कहां रह जाती है। ज़ाहिर है सरताज ने एक ऐसी शुरूआत की है जिसकी हिम्मत भी एक भारतीय ही जुटा सकता है। ये एक भारतीय मुसलमान का दुनिया को साफ संदेश है कि देश पहले है और देश की सुरक्षा और उसकी इज्जत से समझौता नहीं किया जा सकता।  

Sunday, 16 February 2014

               राजनीतिक शहादत पर उठे सवाल

आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल द्धारा पिछले दिनों दिल्ली के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने पर इतना तो साफ हो गया की खुद से इस्तीफा देने और इस्तीफा मांगे जाने में ज़मीन आसमान का अंतर है। अभी तक हमने मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों को अपनी सरकार या खुद की ग़लतियों पर इस्तीफा देते तो देखा है। लेकिन जिस तरह से अरविंद केजरीवाल ने केवल एक बिल की खातिर इस्तीफा दिया उससे कई सवाल उठने लाज़मी हैं। कुछ ने इसे केजरीवाल का मैदान छोड़कर भागना कहा तो कुछ ने उन्हें अनाड़ी सियासतदां तक कह दिया। सिर्फ 49 दिनों तक दिल्ली पर हुकूमत कर चुकि केजरीवाल सरकार का शायद कोई भी दिन ऐसा नहीं गुज़रा जिस दिन किसी नए विवाद ने जन्म न लिया हो।

इसमें कोई शक नहीं के जिस पार्टी को अस्तित्व में आए 2 साल भी न हुए हों उसका दिल्ली की सत्ता को पा लेना कोई आसान काम नहीं था। कांग्रेस के भ्रष्टाचार को हथकंडा बनाकर सियासत में क़दम रखने वाले आम आदमी और उनकी पार्टी को क्या मालूम था की कांग्रेस के समर्थन से ही उसे दिल्ली में सरकार बनानी पड़ेगी। दिल्ली में सरकार बनाने के लिए केजरीवाल ने मत-संग्रह तो करवा लिया लेकिन उनसे शायद जो सबसे बड़ी चूक हुई वो ये की उन्होंने इस्तीफा देने से पहले मत-संग्रह नहीं कराया, उनका ये क़दम अपने आप में कई सवाल खड़े कर रहा है। कई लोग इसे लोकसभा चुनाव की बेचैनी बता रहे हैं तो कुछ जल्दबाज़ी में उठाया गया क़दम। केजरीवाल के इस क़दम से इतना तो साफ है कि जनता के बीच बने विश्वास को आपने कुछ हदतक तो खोया है। विधानसभा चुनाव से पहले आम आदमी पार्टी का मुद्दा जनलोकपाल था जिसकी बदौलत उसने दिल्ली में सरकार बनाई लेकिन दिल्ली को जनलोकपाल बिल नहीं मिल सका और सरकार ने अपने पूरे मंत्रीमंडल के साथ इस्तीफा भी दे दिया। सियासत के जानकार जो अंदाज़ा लगा रहे थे आखिर में वह ही सच हुआ। तो क्या ये समझा जाए की लोकसभा चुनाव में भी पार्टी इसी जनलोकपाल के बहाने अपनी नैय्या पार लगाएगी।

केजरीवाल के इस्तीफे की टाइमिंग या फिर कहें ये राजनीतिक शहादत उनको आगे फायदा पहुंचाएगी या नुक़सान ये तो वक्त ही बताएगा। लेकिन विधानसभा चुनाव में  अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी के नेताओं ने जिस तरह से कांग्रेस के दिग्गजों को धूल चटाई उसने उन सियासी धुरंधरों को ये तो दिखा दिया की सत्ता किसी की जागीर नहीं बल्कि जनता चाहे तो सियासत के बड़े से बड़े सूरमाओं को अर्श से फर्श पर और फर्श से अर्श पर पहुंचा देती है।

फिलहाल आपने लोकसभा चुनाव के लिए अपने उम्मीदवारों की पहली लिस्ट जारी कर एक और चुनावी रण का आग़ाज़ कर दिया है। एक तरफ कांग्रेस के दिग्गज होंगे तो दूसरी तरफ आपके सिपाही। वैसे अबतक जो राजनैतिक दल आम आदमी पार्टी को कम आंक रहे थे अब शायद वो ये ग़लती न करें और इस दफा के लोकसभा चुनाव में वो देखने को मिले जो इतिहास में अबतक देखने को नहीं मिला। बहरहाल, अभी ये देखना दिलचस्प होगा कि देश का आम आदमी देश की सत्ता के सिंहासन पर किसे बिठाता है।

Sunday, 2 February 2014

गुम हुई मुद्दे की बात

देश में आम चुनाव जैसे-जैसे नज़दीक आ रहे हैं, सियासी पार्टियां एक दूसरे पर निशाना साधने का मौक़ा नहीं छोड़ रहीं। सोनिया गांधी अपने भाषण में बीजेपी पर ज़हर की खेती करने का आरोप लगाती हैं तो नरेन्द्र मोदी जवाबी हमला करते हुए कांग्रेस को ही सबसे ज़हरीला और उसपर ज़हर बोने का आरोप लगा रहे हैं।

दरअसल हक़ीकत देखी जाए तो चुनावी रैलियों में अवाम के मुद्दों को नज़रअंदाज़ करके पार्टियां एक दूसरे पर निशाने साधने में मसरूफ दिखाई दे रही हैं। एक दूसरे को घेरने का जो नज़रिया है वो सियासी दलों को जनता के असल मुद्दों से दूर ले जा रहा है। असल मुद्दे की बात गुम होती नज़र आ रही है। देश की सियासत में ये परम्परा अब आम होती जा रही है। जिसका ताज़ा उदाहरण  कर्नाटक के गुलबर्गा में सोनिया गांधी और मेरठ में नरेन्द्र मोदी की शंखनाद रैली में देखने को मिला।

मोदी ने अपनी रैली में कांग्रेस समेत यूपी की अखिलेश सरकार पर निशाना तो साधा लेकिन उन्हें शायद इस बात का ख्याल नहीं रहा कि वो मुज़फ्फरनगर दंगों की निंदा करते और दोषियों को ठोस सज़ा दिए जाने की मांग करते। शायद उससे लोगों के बीच एक पॉज़ेटिव संदेश जाता। हालांकि जिन बीजेपी नेताओं पर मुज़फ्फरनगर में ज़हर घोलने के आरोप लगे थे और जो कुछ दिन जेल में भी रहे थे उन्हें मोदी एक सभा में खुद माला पहना चुके हैं।

नरेन्द्र मोदी को इतना बखूबी मालूम है कि 2014 के रण में अल्पसंख्यकों के बिना भी जीत के आंकड़े को वो छू सकते हैं। शायद इसीलिए वो अपने भाषणों में अक्सर दलितों, किसान बहु-बेटियां की बात तो करते हैं लेकिन उन अल्पसंख्यकों की बात नहीं करते जिनके विकास के बिना देश का विकास अधूरा है।

मेरठ में आज़ादी के बाद से अबतक सैकड़ों दंगे हुए, हज़ारों लोग मरे, नफरत के बीज बोए गये, सत्ता में कई पार्टियां आईं और गईं लेकिन किसी ने भी वहां की अवाम में ये यकीन पैदा करने की कोशिश नहीं की जिससे वो खुद को सुरक्षित समझें। आखिर ऐसा ताना-बाना, सरकार और नेता कहां से आएंगे जो जनता को सवाल खड़े करने का मौक़ा न दे। अगर विभिन्न पार्टी शासित प्रदेशों में वहां की सरकारें काम करें और किसी को भी उंगाली उठाने का मौक़ा न दें तो ये एक दूसरे को कटघरे में खड़ा करने का चलन भी शायद खत्म हो जाए।  

मोदी ने मेरठ की रैली में ये ऐलान तो कर दिया की अगर वो देश की सत्ता में आए तो यूपी को दंगा-मुक्त प्रदेश बनाएंगे। लेकिन इसकी शुरूआत अगर वो मज़फ्फरनगर दंगों के दोषियों को सज़ा दिए जाने की मांग के साथ करते तो अच्छा होता। ज़ाहिर है सियासत में भी सभी के अपने-अपने तौर-तरीक़े हैं लेकिन असल मुद्दे की बात कम ही नेता करते हैं और जो करता है अवाम उसे ही मौक़ा भी देती है। फिलहाल इस चुनावी मौसम में सियासी पार्टियां रैलियां कर शक्तिप्रदर्शन दिखाती रहेंगी, लेकिन जनता के पास लोकतंत्र में सबसे बड़ी ताक़त है जिसका उसे सही इस्तेमाल करने की ज़रूरत है।

Monday, 30 December 2013

  2013 के न भूलने वाले ज़ख्म

नए साल की खुशियों के बीच शायद बहुत सारी बीती बातें भुला दी जाएंगी। लेकिन क्या सभी कुछ? यह कैसे भूल जाया जाए कि पिछले साल, यानी 2013 में इंसानियत एक बार फिर शर्मसार करने वाले दंगों की भेंट चढ़ी। गुजरात दंगा पीड़ितों के जख्म अभी पूरी तरह ठंडे नहीं हुए हैं। लेकिन मुजफ्फरनगर दंगों ने समाज को फिर से कठघरे में खड़ा किया। मुझे इस बहस में नहीं पड़ना कि दंगे क्यों हुए, इसका जिम्मेदार और असल गुनहगार कौन है? लेकिन यह सवाल मन में बार-बार उठ रहा है कि क्या सरकारें वाकई इतनी बेपरवाह और गैरजिम्मेदार हो सकती हैं? बकौल एक शायर के मुझे कुछ ज़ख्म भी ऐसे मिले हैं, की जिनका वक्त भी मरहम नहीं है। 2014 का नया साल तो आ गया है लेकिन ये दंगा पीड़ितों के लिए वाक़ई नई उम्मीद लेकर आएगा इसका जवाब शायद किसी के पास नहीं है। जहां हुकूमत खुद बेकस और मजबूर मालूम हो। जिस देश में अब भी सैकड़ों लोग दंगों की भेट चढ़ जाते हों वहां विकास मॉडल और ह्यूमन डवलपमैंट इंडेक्स जैसे शब्द महज़ दिखावा लगते हैं।
दंगा पीड़ितों से मुलाक़ात करते पी.एम और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी
आज लगभग चार महीने गुज़र जाने के बाद भी मुज़फ्फरनगर दंगा पीड़ित अपने घरों को वापिस लौटने के लिए तैयार नहीं हैं। दंगों में अपनों को खो चुके कई लोगों का कहना है कि वो घर नहीं जाएंगे भले ही जिंदगी चली जाए। आखिर उनके मन में बैठ चुके खौफ को दूर करने और उन्हें सुरक्षित उनके वतन में बसाने की ज़िम्मेदारी किसकी है ? ऊपर से अगर समाजवादी पार्टी के मुखिया और सूबे के अधिकारी बड़बोले बयान देकर सारी हदें लांघ जायें तो वाक़ई मज़लूमों का दर्द कम होने के बजाय और बढ़ना तय है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट में यूपी सरकार की ये सफाई की मुज़फ्फरनगर दंगे गुजरात दंगों की तरह नहीं थे। खुद कई सवाल खड़े करता है।
     हालांकि एक दुसरा पहलू और कढ़वी सच्चाई ये भी है कि ऐसी घटनाओं के गुनहगार हम सभी हैं। दंगों के बाद जो आपसी विश्वास ध्वस्त हुआ है उसका ज़िम्मेदार इस समाज का वो ताना-बाना ही है जो बार-बार ऐसी घटनाओं को होने से नहीं रोक पाता। आज जो दंगा पीड़ित राहत कैम्पों में रह रहे हैं उनका भविष्य अंधकार में है। कितनी मांओं की गोद सुनी हो चुकि है। कितनों का सुहाग उजड़ गया और कितने बच्चे यतीम हो गये। इस हिंसा में 60 से ज़्यादा लोगों ने अपनी जान गंवाई और 40 हज़ार से अधिक लोग विस्थापित हो गये। अगर इतिहास उठाकर देखें तो देश की आज़ादी के बाद लोगों का ये सबसे बड़ा विस्थापन है।
    हमारी एकता की मिसाल पूरी दुनिया में दी जाती है। जाहिर है, जब इस दुनिया को यह पता चलता है कि नफरत के बीज बोने वाले यहां अब भी चैन की बंसी बजा रहे हैं तो शर्म से उन देशवासियों का सिर झुक जाता है जो नफरत की आग को हमेशा से बुझाते आए हैं। पिछली घटनाओं से अगर हमने सबक लिया होता तो ऐसे झकझोर देने वाले वाकयों से बचा सकता था और इनकी वजह से सियासत की यह शक्ल भी हमें नहीं देखने को मिलती। ऐसी सरकारें दरअसल अपने सूबे में बने रहने का हक खो देती हैं जो अपने नागरिकों को महफूज नहीं रख सकतीं। सवाल यह भी है कि किसी को अपने खिलाफ अंगुली उठाने या फिर मुंह खोलने का मौका ही क्यों दिया जाए।

यह 2014 का आगाज है। इन दंगा पीड़ितों के जख्म शायद वक्त के साथ भर जाएं। लेकिन इस बात की गारंटी कौन देगा कि फिर से देश में कहीं और कभी भी दंगे नहीं होंगे? आगे कभी मुल्क की फिजां में जहर घुलने नहीं दिया जाएगा, इंसानियत फिर शर्मसार नहीं होगी? ये ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब हमारे रहनुमाओं को तलाशना है। फिलहाल बस यह एक उम्मीद भर है कि शायद हमारा आने वाला कल आज से बेहतर और सुरक्षित हो पाए।

Sunday, 8 September 2013


फिर दंगों की भेट चढ़े पत्रकार
आखिर कबतक पत्रकार दंगों की भेट चढ़ते रहेंगे। सवाल है कि आखिर कबतक लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की बुनियाद को यूं ही हिलाया जाता रहेगा। मुज़फ्फरनगर की घटना में आम अवाम समेत पत्रकारों की मौत के बाद फिर से उत्तरप्रदेश की कानून व्यवस्था पर सवाल उठने लगे हैं। कम से कम पत्रकार भाइयों से गुज़ारिश है कि वो मुज़फ्फरनगर में मारी गई अवाम और पत्रकारों के साथ खड़े नज़र आयें। जाने वाले तो चले गए क्यूँ न आगे ऐसी कोशिश हो की किसी का सुहाग न उजड़े, किसी की गोद सूनी न हो. आमीन  

Wednesday, 3 July 2013

Shayari on Uttarakhand Tragedy...


دیکھتے  ہی دیکھتے ہو گیا برباد سب
اس طرح اجڑے نہ کوئی یہ تمنّ ہے میری

یوں تو امبر مجھ کو لگتے ہیں بھوت اچھے مگر
کیا تباہی کر گئے وہ دیکھتے ہی دیکھتے

ماں سے بچے،بھائ سے بہنیں چھنیں
اس طرح برباد نہ ہو کوئی گھر

ایے خدا آگے نہ ہو ایسی تباہی پھر کبھی
اس طرح پروت نہ اجڑے اور ندیاں پھر کبھی

جو نہیں مل پائے انکو کھوجتی ہے یہ نگاہ
ہے دعا  اختر کی یہ مل جاییں سب