Friday, 7 December 2018

ईरान के साथ फिर खड़ा हुआ भारत


ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंधों के बीच भारत और ईरान के बीच अहम समझौता हुआ है। बताया जा रहा है कि इस समझौते के तहत भारत को ईरान से कच्चा तेल खरीदने के लिए डॉलर पर निर्भर रहने की मजबूरी नहीं रहेगी। भारत रुपये के जरिए से ईरान को भुगतान कर कच्चा तेल खरीद सकेगा। ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंध लगे एक महीने से ज्यादा का वक्त हो चुका है। इस प्रतिबंध के चलते दुनिया का कोई भी देश ईरान से ट्रेड नहीं कर सकता है। भारत और चीन ईरान के सबसे बड़े ट्रेडिंग पार्टनर हैं और ईरान पर प्रतिबंध में भारत और चीन समेत कुल देशों को कारोबार बंद करने के लिए महीने की मोहलत मिली है।

हाल में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर प्रतिबंध का ऐलान करते हुए कहा था कि नवंबर के बाद अगर कोई भी देश ईरान से कच्चा तेल खरीदता है तो सख्त से सख्त कदम उठाने के लिए वो तैयार हैं। ट्रंप ने मई में अमेरिका को 2015 में हुए ईरान परमाणु समझौते से अलग कर लिया था और उस पर फिर से प्रतिबंध लगाए।वहीं, ईरानी राष्ट्रपति हसन रुहानी ने अमेरिका पर पलटवार करते हुए सख्त लफ्जों में कहा था कि वो ईरान के तेल का निर्यात रोक नहीं सकता है और अमेरिका अगर ऐसा करने की कोशिश करता है तो फारस की खाड़ी से कोई तेल बाहर नहीं जाने दिया जाएगा।हालांकि ये भी सच है कि ईरान 1980 के दशक से ही अंतरराष्ट्रीय दबाव के मद्देनजर बार बार खाड़ी से तेल का निर्यात रोकने की धमकी देता रहा है लेकिन उसने ऐसा कभी किया नहीं है। 

वहीं ईरान के साथ परमाणु समझौते में शामिल दूसरे पक्ष अमेरिका के प्रतिबंधों का विरोध कर रहे हैं। विरोध करने वाले देश ब्रिटेनफ्रांसचीन और रूस हैं। ये देश ईरान परमाणु समझौते को जारी रखना चाहते हैं। संयुक्त राष्ट्र निरीक्षकों का भी मानना है कि ईरान परमाणु समझौते की शर्तों पर कायम है। हालांकिइस मुद्दे पर अपने को इस्लामिक देश कहने वाला सउदी अरब अमेरिका का एकमात्र समर्थक देश है।

भारत में करीब 12% कच्चा तेल सीधे ईरान से आता है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक पिछले वर्ष भारत ने ईरान से करीब सात अरब डॉलर के कच्चे तेल का आयात किया था। भारत और ईरान के बीच दोस्ती के मुख्य रूप से दो आधार हैं। एक भारत की ऊर्जा ज़रूरतें हैं और दूसरा ईरान के बाद दुनिया में सबसे ज़्यादा शिया मुसलमानों का भारत में होना।भारत में करीब 5 करोड़ शिया मुसलमानों की आबादी है। भारत ने हाल ही में ईरान के चाबहार पोर्ट को विकसित करने का जिम्मा उठाया है जिससे भारत को अफगानिस्तान पहुंचने के लिए पाकिस्तान जाने की जरुरत नहीं होगी। ये पोर्ट गुजरात के कांदला पोर्ट से केवल छह सौ किलोमीटर की दूरी पर है भारत को वहां सामान पहुंचाने में पांच से छह दिन लगेंगे फिर चाबहार से सेंट्रल एशिया या अफगानिस्तान हमारा सामान आसानी से चला जाता है।





Friday, 23 November 2018

राम मंदिर, राजनीति और रामराज्य !

बाबरी मस्जिद विध्वंस को इसी साल 6 दिसंबर को 26 साल होने जा रहे हैं। राम मंदिर आंदोलन से खड़ी हुई बीजेपी मंदिर निर्माण के मुद्दे को समय-समय पर कैश करती रही है। विकास के नाम पर सत्ता में आई बीजेपी 2019 चुनाव से पहले एक बार फिर इस मुद्दे को भुनाने में जुटी है। संसद में कानून बनाकर राम मंदिर निर्माण को लेकर चर्चा तेज है लेकिन सवाल ये कि जब संसद के जरिए ही राम मंदिर निर्माण का मु्द्दा हल होना है तो इसमें मोदी सरकार को साढ़े 4 साल का वक्त क्यों लगा।कानून के जानकारों के मुताबिक क्योंकि मामला अभी कोर्ट में पेंडिंग है ऐसे में अपील पेंडिंग रहने के दौरान विवादित स्थल पर यथास्थिति बहाल रखने के लिए कहा गया है। ऐसे हालात में सरकार आधिकारिक तौर पर दखल नहीं दे सकती। हां, अगर पक्षकार चाहें तो किसी भी स्टेज पर समझौता कर सकते हैं।  केंद्र सराकर 1993 में अयोध्या अधिग्रहण अधिनियम लेकर आई थी जिसके तहत विवादित भूमि और उसके आस-पास की जमीन का अधिग्रहण करते हुए पहले से जमीन विवाद को लेकर दाखिल याचिकाओं को खत्म कर दिया गया था। सरकार के इस अधिनियम को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी गई थी। जिसके बाद 1994 में अदालत ने इस्माइल फारूखी मामले में आदेश देते हुए तमाम दावेदारी वाली अर्जियों को बहाल कर दिया था और जमीन केंद्र सरकार के पास रखने को कहा था। अदालत ने निर्देश दिया था कि जिसके पक्ष में फैसला आएगा उसे जमीन सौंप दी जाएगी। तो क्या ये मान लिया जाए कि बीजेपी के पास अब एक चारा बचता है कि वो संसद में अध्यादेश लाए भले ही वो कानूनी पेचीदगियों की वजह से गिर जाए। साफ है कि बीजेपी अब अजीब कशमकश में है। हिंदुओं की भावनाओं की बात करने वाली बीजेपी खुलकर कुछ नहीं कह पा रही है।   
राम मंदिर निर्माण को लेकर मोदी सरकार पर दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है सवाल 2019 चुनाव का है, लोकसभा चुनाव से पहले अगर बीजेपी इस मुद्दे का हल निकालने में नाकाम रहती है तो जाहिर है बीजेपी के लिए आगे की राह बहुत कठिन हो जाएगी। 2019 चुनाव में जनता बीजेपी से ये जरूर पूछेगी के पूर्ण बहुमत के बावजूद भी राम मंदिर निर्माण के लिए उसने क्या किया और 2019 में बीजेपी नेता जनता के पास क्या मुंह लेकर जाएंगे आज भी टीवी डिबेट्स में कुछ लोग राम मंदिर मुद्दे का हल बातचीत से हल करने की बात कर रहे हैं जो अब बेमानी सा लगने लगा है।
दोनों पक्षों ने इस मुद्दे का हल अगर मिल बैठकर निकाल भी लिया तो बीजेपी के राम मंदिर आंदोलन का क्या होगा ? राम मंदिर निर्माण के लिए इसे आंदोलन का रूप देने वाली बीजेपी हिंदुओं को अबतक ये बताने में नाकाम रही है कि वो राम मंदिर निर्माण का रास्ता कैसे साफ करेगी और मंदिर कबतक बनकर तैयार होगा ? 

तो क्या ये मान लिया जाए कि बीजेपी को भगवान राम की याद चुनाव से 6 महीने या साल भर पहले ही आती है। विपक्षी पार्टियां भी ये आरोप लगाती रही हैं कि बीजेपी राम मंदिर मुद्दे पर केवल राजनीति करती आई है। ऐसे में जबतक राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ नहीं होता तबतक बीजेपी सरकार क्यों नहीं अपने विकास के एजेंडे से लोगों के दिलों को जीतने का काम करती ? वो ये क्यों नहीं सुनिश्चित करती के हर एक भारतीय के पास रोटी,कपड़ा और मकान  हो। हर एक भारतीय को रोजगार का अधिकार मिले। लाखों पढ़े-लिखे युवक आज बेरोजगार क्यों हैं ? क्या राम मंदिर के साथ रामराज्य की जरूरत नहीं है ? क्या रामराज्य की बात नहीं होनी चाहिए जहां एकता, समानता और न्याय हो, जहां गरीबी और बुखमरी से पूरी तरह निजात हो, जहां अपराध मुक्त समाज हो। राम मंदिर मुद्दे पर राजनीति करने के बजाय आज भगवान राम के आदर्शों की बात कितने लोग करते हैं उनके बताए हुए वचनों पर कितने लोग अमल करते हैं ? 1992 में बाबरी विध्वंस के दौरान जिस तरह से दंगे भड़के और सैकड़ों लोगों की जान गई उसे कैसे जायज ठहराया जा सकता है। उनके परिवारवालों को आजतक इंसाफ नहीं मिला। वो नेता आज भी खुले घूम रहे हैं जिन्हों 1992 में दंगे भड़काए और अपना सियासी करियर चमकाने के लिए हिंदू-मुसलमानों को लड़वा दिया क्या आज भी वैसे ही हालात पैदा करने की कोशिशें हो रही हैं। कुछ लोग 1990 में कारसेवकों पर गोली चलाने को लेकर भी सवाल उठाते हैं जाहिर है तब जो हुआ वो सरकार के कहने पर हुआ कानून,व्यवस्था एक मुद्दा हो सकता है लेकिन उस दौरान कोई भी कारसेवक दूसरे पक्ष की गोली का शिकार नहीं हुआ था इसलिए 1992 की घटना से इसकी तुलना करना बेमानी है।

2019 चुनाव से ठीक पहले मंदिर निर्माण के नाम पर देश में एक बार फिर जिस तरह का माहौल बनाने की कोशिशें हो रहीं हैं उसे समझना कोई बहुत मुश्किल नहीं है।अगर अभी बीजेपी की कोशिशों से राम मंदिर का रास्ता साफ हो भी जाता है तो क्या 2019 में इसी पैमाने पर हिंदू मतदाता बीजेपी को वोट करेंगे।क्या बेरोजगारी,भ्रष्टाचार,आतंकवाद,नक्सलवाद जैसे मुद्दे मतदादा के लिए मुद्दे नहीं रह जाएंगे। पीएम मोदी ने 2014 से पहले जो बड़े-बड़े वादे किए थे उन वादों का क्या होगा।भगवान राम ने चाहा तो राम मंदिर जरूर बनेगा और जो लोग इसे लेकर केवल राजनीति कर रहे हैं उनकी अंत में हार होगी मुझे उम्मीद है रामराज्य जरूर आएगा।    
  


Wednesday, 14 November 2018

सऊदी का ये घिनौना चेहरा देख लें दुनिया के मुसलमान !


खुद को मुस्लिम दुनिया का नेता बताने वाले सऊदी अरब की पोल एक बार फिर खुल गई है। अमेरिका से सऊदी अरब की नजदीकियां किसी से छिपी नहीं हैं और इन नजदीकियों की एक वजह सऊदी अरब का ईरान से नफरत भरा रवैया रहा है जो वक्त-वक्त पर खुलकर सामने आया है। ये किसी से छिपा नहीं है कि अमेरिका और ईरान के बीच हमेशा से तल्ख रिश्ते रहे हैं और कुछ ऐसा ही सऊदी अरब और ईरान के बीच रहा है। ऐसा कई बार हुआ जब अपने को मुस्लिम राष्ट्र बताना वाला सऊदी अरब कई बार खुद मुस्लिम देश ईरान की जड़ें काटते हुए बेपर्दा हो चुका है।

हाल में सामने आई अमेरिकी जस्टिस विभाग की रिपोर्ट में पता चला है कि ईरान के परमाणु क़रार के बाद सऊदी अरब ने लॉबीइंग के ख़र्च में बहुत ज़्यादा इज़ाफ़ा किया है। साल 2014 में उसने इस मद में छह मिलियन डॉलर ख़र्च किए थे जबकि उसका यही ख़र्च साल 2015 में लगभग 15 मिलियन डॉलर तक पहुंच गया था।

दैनिक क्रिश्चियन साइंस मॉनीटर की साल 2016 की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ साल 2015 में सऊदी अरब ने वॉशिंगटन में लॉबीइंग करने वालों को जो रक़म दी उसका ज्यादातर हिस्सा सिर्फ एक लक्ष्य पर ख़र्च किया गया और वह लक्ष्य था ईरान के खिलाफ सऊदी अरब के विचारों का प्रचार-प्रसार। दस्तावेज़ से ये भी पता चलता है कि एमएसएल ग्रुप नाम की एक कंपनी ने परमाणु क़रार के बाद तीन साल में सऊदी अरब से छह मिलियन डॉलर हासिल किया और इसके बदले क्षेत्र में ईरान की गतिविधियों के खिलाफ सामग्री तैयार करके इसे नियमित रूप से अमरीकी नेताओं को बांटा।

एक हफ्ते पहले ही अमेरिका ने ईरान पर फिर से कड़े प्रतिबंध लागू किए हैं।  ईरान के साथ परमाणु समझौते में शामिल बाकी पक्ष अमेरिका के प्रतिबंधों का विरोध कर रहे हैं। विरोध करने वाले ये देश ब्रिटेन, फ्रांस, चीन और रूस हैं। संयुक्त राष्ट्र निरीक्षकों का भी मानना है कि ईरान समझौते की शर्तों पर बना हुआ है। इस मुद्दे पर सऊदी अरब अमेरिका का एकमात्र समर्थक देश है। अमेरिका ने 2015 में ईरान से प्रतिबंध हटाए थे लेकिन राष्ट्रपति ट्रंप ने दोबारा प्रतिबंध लागू कर दिए हैं। अमेरिका ने ईरान पर लगाए गए प्रतिबंधों से 8 देशों को अस्थाई छूट दी है। इन देशों में भारत भी शामिल है। भारत के अलावा चीन, दक्षिण कोरिया, जापान, इटली, ग्रीस, ताइवान और तुर्की को इन प्रतिबंधों से छूट दी गई है। बता दें कि छूट पाने वाले ये 8 देश ईरान के तेल निर्यात का कुल 75 फीसदी खपत करते हैं। 

पिछले करीब 15 सालों में सऊदी अरब और ईरान के बीच दूरियां और बढ़ी हैं। सीरिया में ईरान और रूस ने राष्ट्रपति बशर-अल-असद को समर्थन दिया जिससे सऊदी के समर्थन वाले विद्रोही गुटों को हटाने में कामयाबी मिली।उस वक्त ईरान, सीरिया के साथ खड़ा था जब सीरिया के शहरों से ISIS के आतंकियों को खदेड़ा जा रहा था लेकिन उस समय भी सऊदी अरब का दोहरा चेहरा दुनिया ने देखा था। सऊदी अरब ने आतंकवाद से लड़ने के नाम पर 24 मुस्लिम देशों का एक समूह बनाया था हैरानी की बात ये थी के उस समूह में ईरान का ही नाम नहीं था।
    ईरान और सऊदी अरब की सैन्य शक्ति पर नजर डालें तो ईरान का पलड़ा भारी है। ईरान के पास पांच लाख 63 हज़ार सशस्त्र बल हैं जबकि सऊदी के पास महज दो लाख 51 हज़ार 500  सशस्त्र बल हैंईरान के पास एक हज़ार 513 युद्धक टैंक हैं जबकि सऊदी के पास 900ईरान के पास 6 हज़ार 798 तोपख़ाने हैं जबकि सऊदी के पास महज 761ईरान के पास 336 लड़ाकू विमान हैं, हालांकि ये पुराने हैं और इनकी मरम्मत की ज़रूरत हैसऊदी के पास 338 आधुनिक लड़ाकू विमान हैं।ईरान के पास 194 गश्ती नाव हैं और सऊदी के पास 11 ही हैं। ईरान के पास 21 युद्धपोत हैं जबकि सऊदी के पास एक भी नहीं है।