Thursday, 3 June 2010

An Earnest Appeal


There is a gentleman living in a graveyard of Faizabad City ( U.P). He is Mohd.Shareef aged about 75 years old. He is attached with such a profession in which no person of any community can involve himself happily i.e. to cremate/bury the unclaimed deadbodies without knowing their cast or creed.Mr.Shareef is involved in this pious duty for the last morethan twenty years . He started this noble deed when he lost his son in an accident whose burial took place by unknown person.

So far Mr.Shareef has cremated/buried about 1300-1400 deadbodies with Hindu/Muslim rituals and customs .We the team of deadicated young professionals actively engaged as students of Ajk Mass Communication and other well wishers are planning to visit faizabad to make a Documentary as soon as possible as we also fear that after Mohd.Shareef who will attend this challenging job in Faizabad without any lust.

By profession Mr.Shareef is a bi-cycle mechanic .

I earnestly appeal or wellwishers to come out for this noble cause and assist us to complete the outstanding project by visiting the city in late June 2010 for twenty minutes documentary film.

This will cost rupees approximately 50,000 including some financial assistance to Mr.Shareef. So far we have collected about rupees 5,000 from friends and well wishers so far.

Looking forward an encouraging reply from good fellow citizens.


Contact Please –

Shah Alam – 9873672153
Syed Ali Akhtar - 9871511120

Thursday, 20 May 2010

जातिवादी हत्याओं के खिलाफ आंदोलन में हम साथ हैं


झारखंड राज्य के कोडरमा में निरूपमा पाठक की हत्या जैसी घटनाएं पूरे देश में बड़ी तादाद में घट रही है। इस तरह की घटनाएं विभिन्न रूपों में न जाने कितने वर्षो से जारी है। 1990 के पहले दो अलग अलग जाति की लड़की और लड़के के एक दूसरे के साथ जीने का फैसला करने पर पिता और उसके परिवार के सदस्यों के द्वारा उनकी हत्या करने की एक दो घटनाएं ही सामने आती थी। लेकिन खबरों के नहीं आने का अर्थ ये नहीं है कि ऐसी घटनाएं नहीं होती थी। हत्याएं कम होती थी तो आत्म हत्याएं ज्यादा होती थी। आंकड़े जुटाएं जा सकते हैं कि कितनी लड़कियों ने जहर खाकर, कुएं में कूदकर या गले में फंदा लगाकर आत्महत्याएं की होगी। पहले कम उम्र में लड़कियों की शादी कर दी जाती थी। उनके पढ़ने की मनाही थी। पति की मौत के बाद सती बनने का दबाव था। पति की मौत के बाद लड़की की शादी की इजाजत नहीं थी। दहेज के नाम पर हत्या कर दी जाती थी। निश्चित तौर पर समाज में वर्चस्व रखने वाली जातियों और वर्चस्ववादी संस्कृति को ढोने वालों के बीच ये समस्या बनी हुई थी।इसके खिलाफ सुधार के आंदोलन किए गए।स्थितियों में बदलाव आया लेकिन वह समाप्त नहीं हुआ। विचार के रूप में उसके अवशेष अब भी बने हुए हैं।

समाज में स्त्रियों को नीचले व दूसरे दर्जे में रखा जाता है।पुरूष सत्ता ने अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए धर्म और जाति का ढांचा तैयार किया है।बल्कि यूं भी कहा जा सकता है कि इन ढांचों का निर्माण इस तरह से किया गया है कि समाज पर वर्चस्व रखने वाला पुरूष समूह तो सर्वश्रेष्ठ बना रहे और समाज के बाकी के हिस्सों में एक दूसरे को नीचा , कमजोर, दोयम दर्जे, यानी अपने से छोटा मानने का विचार अपनी जड़े जमा लें। इसीलिए भारतीय समाज में ये देखने को मिलेगा कि यहां वर्ण के रूप में वर्ण एक दूसरे से नीचे या श्रेष्ठ है। जातियों में दूसरी जातियां एक दूसरे से नीची या श्रेष्ठ है। निरूपमा पाठक के पिता ने संविधान की जगह पर सनातन धर्म को श्रेष्ठ बताया है। उन्होने अपनी बेटी के नाम लिखे पत्र में कायस्थ जाति के प्रियभांशु को निम्न वर्ण का बताया है। जबकि भारतीय समाज में कायस्थों को सवर्ण माना जाता है। हर जाति में भी एक दूसरे से श्रेष्ठ या नीचे वाले गोत्र है। इस तरह से एक दूसरे को एक समान महसूस करने और उस तरह से व्यवहार करने का विचार ही दिल दिमाग में जगह नहीं बना पाता है। ये विचार इतना कट्टर है कि इस पर वर्चस्व रखने वाला समूह उसे बचाने के लिए हर तरह की गुलामी भी स्वीकार कर लेने को तैयार हो जाता है।किसी भी तरह की नृशंसता पर उतारू हो जाता है।निरूपमा पाठक की अपने ही परिवार में हत्या इसका एक उदाहरण भर है।



27 मार्च 1991 को मथुरा जिले के मेहराना गांव में रोशनी, रामकिशन और बृजेन्द्र को पेड़ से सरेआम लटकाकर मार दिया गया था। इन तीनों को लटकाकर मारने का फैसला गांव के दबंगों के प्रभाव में बुलाई गई पंचायत में लिया गया था। रोशनी जाट थी और बृजेन्द्र दलित था। राम किशन अपने दोस्त रोशनी और बृजेन्द्र के रिश्ते में मददगार था। इस घटना के बाद कई राजनेता मेहराना गए थे। लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने भी उस घटना पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की थी। खुद मीरा कुमार की भी शादी अंतर्जातीय है। उनकी शादी कोईरी जाति में जन्मे व्यक्ति से हुई हैं। ये जाति बिहार में पिछड़ी जाति मानी जाती है।मेहराना की घटना के बाद शोरशराबा मचने पर तीन युवाओं को पेड़ पर लटकाकर मारने वालों में कुछेक को पुलिस ने पकड़ा भी ।लेकिन ऐसी घटनाओं पर रोक नहीं लगाई जा सकी। पुलिस में काम करने वाले लोग भी खाप पंचायतों में बैठने वाले लोगों के बीच के या निरूपमा के पिता के कट्टरपंथी दिमाग के ही होते हैं। उनके भी विचार ऐसी घटनाओं को संविधान विरोधी और लोकतंत्र विरोधी मानने के लिए तैयार नहीं होता है। यही हाल कचहरियों और न्यायालयों में न्याय की कुर्सी पर बैठने वालों का भी है। मीडिया में काम करने वालों का भी है। और इन सबसे बढ़कर वोट की राजनीति करने वाले नेता हैं। वे तो समाज पर वर्चस्व रखने वालों के पिछ्लग्गू की तरह काम करते हैं। जैसे हमें अभी हरियाणा के युवा, उद्योगपति और कांग्रेस के सांसद नवीन जिंदल के रूप में देखने को मिल रहा है। वे हरियाणा में खाप पंचायतों के साथ होने की कसमें खा रहे हैं। इसीलिए मेहराना की घटना के बाद देश के विभिन्न हिस्सों में अपनी शादी का फैसला करने वाले लड़के लड़कियों के मारे जाने की खबरें बड़ी तेजी के साथ सामने आई है। लड़के के पिता मां इसीलिए अपने पुत्र की शादी उसकी पसंद की लड़की से करने को तैयार नहीं होते है क्योंकि लड़की उनकी जाति की नहीं होती है। संविधान अठारह वर्ष की उम्र पार करने वाले को व्यस्क मानती है और उसे देश में सरकार बनाने के लिए वोट देने का अधिकार देती है। व्यस्क होने का अर्थ ये होता है कि लड़का और लड़की अपने स्तर से फैसला कर सकें। लेकिन पिता की जाति और धर्म लड़के को लड़की चुनने का अधिकार नहीं देती है और लड़की को अपनी पसंद के लड़के को चुनने का अधिकार नहीं देना चाहती है। महज इन बीस वर्षों में लड़के और लड़कियों के अपने मां बाप के द्वारा मारे जाने की सैकड़ों घटनाएं सामने आ चुकी है। आत्म हत्याओं की भी तादाद कम नहीं है। लेकिन इस बीच में एक तरह की नई घटना के रूप में लड़कियों की तस्वीरें समाचार पत्रों में छपने की आई है। हर दिन किसी न किसी अखबार में किसी न किसी लड़की के घर से भाग जाने या अपहरण किए जाने की जानकारी देने वाला विज्ञापन पुलिस विभाग द्वारा प्रकाशित कराया जाता है। उसमें लड़की के लापता होने की जानकारी होती है । उसमें ये संकेत मिलता है कि वह लड़की घर से भाग गई है। या फिर लड़की जिसे पसंद करती है उस लड़के के द्वारा उसके अपहरण करने की जानकारी दी जाती है। अपनी पसंद से अपने जीवन साथी का चुनाव करने वाले लड़के बड़ी तादाद में अपहरणकर्ता के रूप में अपराधी करार दिए गए हैं।



निरूपमा पाठक की हत्या महज एक नई और घटना हैं। इसके बाद भी कई घटनाएं सामने आई है और निरंतर आ रही है। यह महिलाओं की आजादी के मसले पर यह एक नये तरह के आंदोलन का दौर हैं। यदि अतीत से अब तक की घटनाओं पर गौर करें तो महिलाओं की आजादी में सबसे बड़ी बाधा जाति और धर्म बना हुआ है। लिहाजा पहला काम तो हमें ये करना चाहिए कि इस तरह की हत्याओं को अंग्रेजी के शब्द ऑनर के विशेषण से संबोधित करना बंद करना चाहिए। इससे इस तरह की घटनाओं के सांस्कृतिक कारणों को समझने में उलझन होती है। ये हत्याएं जातिवादी हत्याएं हैं। इन्हें जातिवादी हत्या के रूप में संबोधित करना चाहिए। दूसरे ये बात भी समझना चाहिए कि खाप पंचायतें न केवल महिलाओं के विरोध में तरह तरह के फैसले करती है बल्कि वही पंचायतें दलितों के खिलाफ भी उसी तरह से फैसले लेती है। दलितों को भी जलाने और मारने की घटनाएं हमारे सामने आती है। हरियाणा के गोहाना में दलित मुहल्ले पर हमला और दलितों के घरों को जलाने जैसी घटनाएं हमारे सामने इस रूप में सामने आई है कि वह पुलिस की मौजूदगी में हुई। खाप पंचायतों की मानसिकता वैसे हर परिवार में बनी हुई है जो दूसरी जाति और दूसरे धर्म से नफरत करती है। निरूपमा की हत्या के मामले को लेकर जगह जगह प्रदर्शन और दूसरे कार्यक्रम हो रहे हैं। पहले भी ऐसी कई घटनाओं को लेकर विरोध कार्यक्रम हुए हैं। लेकिन हजारों वर्षों से भारतीय समाज को नुकसान पहुंचाने वाली इस तरह की मानसिकता के खिलाफ निरंतर आंदोलन चलाने की जरूरत है। ज्यादा से ज्यादा अंतर्जातीय व अंतर्धर्म में शादी विवाह को प्रोत्साहित करने की जरूरत हैं।हमें ये समझना होगा कि जातिवादी मानसिकता एक तरफ अपने से कमजोर समझी जाने वाली जातियों के खिलाफ हमलावर होती है तो दूसरी तरफ उसी जातिवादी मानसिकता से वह अपने घरों के बेटे बेटियों को भी उत्पीडित करती है। उसे आधुनिक बनने से रोकती है। उसे संविधान से अपने फैसले लेने के चुनाव के अधिकार का हनन करती है। उसे जातिवादी विहीन और धर्मनिरपेक्ष समाज बनाने से रोकती है। हमें इस लड़ाई में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेना चाहिए। राजनीतिक पार्टियां वोट की राजनीति की वजह से चुप्पी साधे हुए हैं। जबकि ये समस्या राजनीतिक परिवारों के बेटे बेटियों के समक्ष भी आती है। कई राजनीतिक परिवारों में भी इस तरह की हत्याएं हो चुकी है लेकिन वे अपने राजनीतिक प्रभाव के कारण बच निकलें हैं। लिहाजा ये हमारी जिम्मेदारी है कि युवा वर्ग के सदस्य आजादी से अपने जीवन साथी का चुनाव कर सकें, ऐसा माहौल विकसित करना चाहिए। हमें समाज में उन तमाम शक्तियों और विचारों से लड़ने के लिए खुद को तैयार करना होगा जो देश के युवा वर्ग को जातिवादी और धर्म के दायरे में बांधे रखने के हर संभव कोशिश कर रही है। शिक्षण संस्थानों में लगातार इस विषय पर हमें गोष्ठियां आयोजित करनी चाहिए। पर्चे वितरित करने चाहिए। युवाओं की हत्या से युवाओं के बड़े वर्ग को डराने धमकाने की जो कोशिश की जाती है उस डर और भय को दूर कर उन्हें समझदारी से फैसले लेने के पक्ष में माहौल बनाने की हमारी जिम्मेदारी है। ये एक बड़े समाज सुधार के आंदोलन की आहट है। इसे हमें सुनना चाहिए और उसी दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।


अनिल चमड़िया, विजय प्रताप (9015898445), सपना चमड़िया ,ऋषि कुमार सिंह, मुकेश चौरासे,    अली अख्तर, गुफरान खान, गौरव, देवाशीष प्रसून, चन्द्रिका, अनिल, अवनीश ,शाह आलम, नवीन, अरूण उरांव, प्रबुद्ध गौतम, राजीव यादव, शहनवाज आलम, विवेक मिश्रा,रवि राव, लक्षमण, अर्चना महतो, पूर्णिमा,मिथिलेश प्रियदर्शी, दिनेश मुरार एवं अन्य साथी

Friday, 19 March 2010

Breaking News !

Media Scholarship for Muslim students at IMII

New Delhi: Here is good news for the students belonging to Muslim and other backward communities and who aspire to become journalist. The International Media Institute of India (IMII), in its noble initiative to support the interests of these groups, is offering full scholarship assistance for limited number of students. IMII, located in Noida near Delhi, offers an 11-month post-graduate diploma in multimedia journalism. The classes will start on 5th July 2010.
The amount of scholarship is up to Rs 50,000.
Eligibility criteria:
Candidate should be Muslim. The annual income of his/her parent should be less than Rs 10 lakh and minimum marks in Graduation must be 45% or up. However, preference will be given to the students coming from small towns and rural areas. Last date for application to avail the scholarship is 15 April 2010. The scholarship fund has been instituted by Dr. Najma Sultana, who was born near Hyderabad and practices medicine in the United States.
According to the institute’s website, students will learn to produce professional news stories for print, audio, video, web and mobile phone platforms. The faculty at IMII is drawn from top Indian and International journalists and the school is affiliated with the City University of New York’s path-breaking Graduate School of Journalism.
IMII is also offering Jane Louis scholarship for those bright and deserving Dalit, Tribal and Backward Class students who lack resources to undertake professional media education.
For full details of the course, scholarship and admissions procedures Jody McPhillips can be contacted at jodymcp@yahoo.com or mobile +91-9958485433.

Institute’s Address:
International Media Institute of India,
D 59, Sector 2, Noida – 201301 (UP)
Phone: 01204228464, 9717966557
http://www.imii.co.in/

Monday, 15 March 2010

बीहड़ में सिनेमा


१६ मार्च २००१० से चम्बल घाटी मे होगा जमावड़ा बीहड़ कभी भी अपनी जगह नहीं बदलते पर बदल गए हैं बीहड़ों के रास्ते और उनकी उम्मीदें !उम्मीदों पर ग्रहण है तो आशाओ पर पानी की गहरी धार.जिसमे से बिना सहारे के निकलना बीहड़ों के खातिर चुनौती भी है और जरुरी भी.कभी बीहड़ो की ओर रुख किया तो उपेक्षा ही नज़र आई .डकैतों के खात्मे के बाद विकास के नाम पर अरबों रुपयें मिले पर विकास आज भी उनसे कोशों दूर है लोगों का रहन-सहन आदिम युग का है .अपराधी यही पनपते है और भोगोलिक परिस्तीथिया उनका साथ देती है.
बीहड़ मैं दस्यु समस्या अभी भी मुह फैलाये खड़ी है.कभी पुलिस का आरोप तो कभी डकैतों की कारगुजारियो का दंश. शायद यही बीहड़ का दुर्भाग्य बन गया है. विकास की बातों पर गोर करें विकास में बीहड़ उपेक्षीत है.क्योंकि विकास का पैकज बुंदेलखंड के हिस्से में जाता है और विकास के
दावे बीहंचल करके ही किया जाता रहा है.यहाँ के स्थानीय नेता भीबीहड़ो का रुख नहीं करना चाहते,लिहाजा उनको बीहड़ो का दर्द नहीं समझ

आता. बीहड़ के गावों के विकास की खातिर " खेत का पानी खेत में और गाँव

का पानी तालाब में " साथ ही अनेक भूमि सुधार योजनाओ का लाभ महज उन्ही

जगहों पर हुआ है जहाँ आला अधिकारियो का दोरा कराया जाना है ,बाकि के

किसानो के हाथ खाली ही रहे हैं. बीहड़वासियों के बूढी आँखों में

विकास के सपने तो पलते है पर हकीकत का रूप लेने से पहले ही कईयों आँखें

बंद हो चुकी हैं उम्मीदों पर ग्रहण है तो भविष्य गर्त में नज़र आता है.

विकास के ठेकेदार रसूख वाले बन बेठे हैं. जिनको विकास के नाम पर हर पांच

साल बाद वोट लेना है. उन्हें इस बात से कुछ लेना देना नहीं है की विकास

की जमीनी हकीकत क्या है ? कभी कोई बीहड़ो का रुख करता भी हैं तो बंजरो

में कटीली झाड़ियो के बीच फिर से खुद को न उलझने का जज्बा लेकर जाता है.

कभी मौत का मंजर आये दिन अखबारों - खबरिया चैंनलो के लिए " चंबल घाटी और

खून " जैसे सीर्षको से पटी रहती थी. वस्तुतः वीहड़अंचल की भोगोलिक

परिस्तिथिया दस्यु समस्याओ के लिए ज्यादा जिम्मेदार रही हैं. डकैतों की

भूमि तो पहले भी चम्बल रहा है. बात करीब १९२० के आसपास की हैं जब

ब्रहमचारी डकैत ने डकेती छोडकर आज़ादी के समर में कूदा था, पर आज़ादी के

इतिहास के समरगाथा से ब्रहमचारी डकैत गायब हैं.बीहड़ न सिर्फ विकास में

बल्कि इतिहास में भी उपेक्षा झेलता आया है. आज बीहड़ की पहचान उसकी बदनामी

से ही होती है. निर्भेय गुर्जर,फक्कड़ ,कुशमा ,रज्जन ,जगजीवन आदि ऐसे नाम

रहे हैं जिन्होंने अपने दस्यु जीवन में बीहड़ों को अपने खौफ से उबरने

दिया वहीँ दस्यु सुन्दरी सीमा परिहार के भाग्य का निर्णय मुम्बैया

फ़िल्मी बाजार तय नहीं कर सका. सवाल यह उठता है की जब विनाश मीडिया की

ख़बरों में नजर आता है तो विकास क्यों उपेक्षित है.

आज बीहड़ों का कसूर क्या है ? क्या यु ही इस पर बदनुमा दाग बरकरार

रहेगा ? या फिर सहयोग की खातिर हाँथ बढाने में कोई झिझक है. हमारा मानना

है कि बीहड़ों का शानदार इतिहास दुनिया के सामने आये ने कि इसका बदनुमा

अतीत. बीहड़ो में कुछ दर्द है कुछ शिकायत हैं कुछ अपनापन है तो कुछ पाने

कि हसरत भी इन बीहड़ो छीपी है . बीहड़ो कि रवानी को दुनिया के सामने लाने

कि हसरत ही फिल्म उत्सव आयोजन का मकसद बनी . उम्मीदों से परे यह फिल्म

उत्सव उन बीहड़ गावो में आयोजित हो रहा है जो दस्युओ से प्रभावित रहे

हैं. इसके साथ ही मार्च में औरैया, इटावा, मालवा, अम्बेडकर नगर, मऊ में

फिल्म उत्सव का आयोजन किया जा रहा है. जिसमे खास तोर से जन सरोकारों पर

केन्द्रित युवा फिल्मकारों कि फिल्मो का प्रदर्शन , जारी एवं मंच प्रदान

कर प्रोत्साहन देना है. "अवाम का सिनेमा " के माध्यम से आम जन संवाद कर

मन की जिज्ञासा शांत कर सके . इसी क्रम में पुरे देश में फिल्म के बहाने

युवा प्रतिरोध को स्वर दे सकेंगे ,यैसी उम्मीद दिखती है.

अभिवादन के साथ ,

शाह आलम

Wednesday, 21 October 2009

     HUM AKAYLAY HI CHALAY THAY JANIBAY MANZIL
LAOG SAATH AATAY GAYE AUR KAARWAAN BANTA GAYA