Monday, 30 December 2013

  2013 के न भूलने वाले ज़ख्म

नए साल की खुशियों के बीच शायद बहुत सारी बीती बातें भुला दी जाएंगी। लेकिन क्या सभी कुछ? यह कैसे भूल जाया जाए कि पिछले साल, यानी 2013 में इंसानियत एक बार फिर शर्मसार करने वाले दंगों की भेंट चढ़ी। गुजरात दंगा पीड़ितों के जख्म अभी पूरी तरह ठंडे नहीं हुए हैं। लेकिन मुजफ्फरनगर दंगों ने समाज को फिर से कठघरे में खड़ा किया। मुझे इस बहस में नहीं पड़ना कि दंगे क्यों हुए, इसका जिम्मेदार और असल गुनहगार कौन है? लेकिन यह सवाल मन में बार-बार उठ रहा है कि क्या सरकारें वाकई इतनी बेपरवाह और गैरजिम्मेदार हो सकती हैं? बकौल एक शायर के मुझे कुछ ज़ख्म भी ऐसे मिले हैं, की जिनका वक्त भी मरहम नहीं है। 2014 का नया साल तो आ गया है लेकिन ये दंगा पीड़ितों के लिए वाक़ई नई उम्मीद लेकर आएगा इसका जवाब शायद किसी के पास नहीं है। जहां हुकूमत खुद बेकस और मजबूर मालूम हो। जिस देश में अब भी सैकड़ों लोग दंगों की भेट चढ़ जाते हों वहां विकास मॉडल और ह्यूमन डवलपमैंट इंडेक्स जैसे शब्द महज़ दिखावा लगते हैं।
दंगा पीड़ितों से मुलाक़ात करते पी.एम और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी
आज लगभग चार महीने गुज़र जाने के बाद भी मुज़फ्फरनगर दंगा पीड़ित अपने घरों को वापिस लौटने के लिए तैयार नहीं हैं। दंगों में अपनों को खो चुके कई लोगों का कहना है कि वो घर नहीं जाएंगे भले ही जिंदगी चली जाए। आखिर उनके मन में बैठ चुके खौफ को दूर करने और उन्हें सुरक्षित उनके वतन में बसाने की ज़िम्मेदारी किसकी है ? ऊपर से अगर समाजवादी पार्टी के मुखिया और सूबे के अधिकारी बड़बोले बयान देकर सारी हदें लांघ जायें तो वाक़ई मज़लूमों का दर्द कम होने के बजाय और बढ़ना तय है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट में यूपी सरकार की ये सफाई की मुज़फ्फरनगर दंगे गुजरात दंगों की तरह नहीं थे। खुद कई सवाल खड़े करता है।
     हालांकि एक दुसरा पहलू और कढ़वी सच्चाई ये भी है कि ऐसी घटनाओं के गुनहगार हम सभी हैं। दंगों के बाद जो आपसी विश्वास ध्वस्त हुआ है उसका ज़िम्मेदार इस समाज का वो ताना-बाना ही है जो बार-बार ऐसी घटनाओं को होने से नहीं रोक पाता। आज जो दंगा पीड़ित राहत कैम्पों में रह रहे हैं उनका भविष्य अंधकार में है। कितनी मांओं की गोद सुनी हो चुकि है। कितनों का सुहाग उजड़ गया और कितने बच्चे यतीम हो गये। इस हिंसा में 60 से ज़्यादा लोगों ने अपनी जान गंवाई और 40 हज़ार से अधिक लोग विस्थापित हो गये। अगर इतिहास उठाकर देखें तो देश की आज़ादी के बाद लोगों का ये सबसे बड़ा विस्थापन है।
    हमारी एकता की मिसाल पूरी दुनिया में दी जाती है। जाहिर है, जब इस दुनिया को यह पता चलता है कि नफरत के बीज बोने वाले यहां अब भी चैन की बंसी बजा रहे हैं तो शर्म से उन देशवासियों का सिर झुक जाता है जो नफरत की आग को हमेशा से बुझाते आए हैं। पिछली घटनाओं से अगर हमने सबक लिया होता तो ऐसे झकझोर देने वाले वाकयों से बचा सकता था और इनकी वजह से सियासत की यह शक्ल भी हमें नहीं देखने को मिलती। ऐसी सरकारें दरअसल अपने सूबे में बने रहने का हक खो देती हैं जो अपने नागरिकों को महफूज नहीं रख सकतीं। सवाल यह भी है कि किसी को अपने खिलाफ अंगुली उठाने या फिर मुंह खोलने का मौका ही क्यों दिया जाए।

यह 2014 का आगाज है। इन दंगा पीड़ितों के जख्म शायद वक्त के साथ भर जाएं। लेकिन इस बात की गारंटी कौन देगा कि फिर से देश में कहीं और कभी भी दंगे नहीं होंगे? आगे कभी मुल्क की फिजां में जहर घुलने नहीं दिया जाएगा, इंसानियत फिर शर्मसार नहीं होगी? ये ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब हमारे रहनुमाओं को तलाशना है। फिलहाल बस यह एक उम्मीद भर है कि शायद हमारा आने वाला कल आज से बेहतर और सुरक्षित हो पाए।

Sunday, 8 September 2013


फिर दंगों की भेट चढ़े पत्रकार
आखिर कबतक पत्रकार दंगों की भेट चढ़ते रहेंगे। सवाल है कि आखिर कबतक लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की बुनियाद को यूं ही हिलाया जाता रहेगा। मुज़फ्फरनगर की घटना में आम अवाम समेत पत्रकारों की मौत के बाद फिर से उत्तरप्रदेश की कानून व्यवस्था पर सवाल उठने लगे हैं। कम से कम पत्रकार भाइयों से गुज़ारिश है कि वो मुज़फ्फरनगर में मारी गई अवाम और पत्रकारों के साथ खड़े नज़र आयें। जाने वाले तो चले गए क्यूँ न आगे ऐसी कोशिश हो की किसी का सुहाग न उजड़े, किसी की गोद सूनी न हो. आमीन  

Wednesday, 3 July 2013

Shayari on Uttarakhand Tragedy...


دیکھتے  ہی دیکھتے ہو گیا برباد سب
اس طرح اجڑے نہ کوئی یہ تمنّ ہے میری

یوں تو امبر مجھ کو لگتے ہیں بھوت اچھے مگر
کیا تباہی کر گئے وہ دیکھتے ہی دیکھتے

ماں سے بچے،بھائ سے بہنیں چھنیں
اس طرح برباد نہ ہو کوئی گھر

ایے خدا آگے نہ ہو ایسی تباہی پھر کبھی
اس طرح پروت نہ اجڑے اور ندیاں پھر کبھی

جو نہیں مل پائے انکو کھوجتی ہے یہ نگاہ
ہے دعا  اختر کی یہ مل جاییں سب 
    

Monday, 25 March 2013

                इराक जंग के 10 साल और सुलगते सवाल
 फोटा-साभार (ये तस्वीर काफी कुछ बयां कर रही है)
राक जंग की 10वीं बरसी के मौके पर दुनियाभर में इस बात को लेकर फिर से बहस छिड़ गई है कि क्या यह जंग ज़रूरी थी। जैविक हथियारों के प्रोपोगेंडा से शुरू किए गए अमेरिका की इस जंग में किसका लाभ और किसका नुकसान हुआ। अमेरिका ने भले ही इराक में घुसकर उसके खिलाफ जंग कर अपने मंसूबों पर कामयाबी हासिल कर ली हो। भले ही उसने सद्दाम को फांसी पर लटका कर चैन की सांस ली हो। लेकिन अमेरिकी नागरिकों के बीच किए गए गैलप सर्वे में 53 फीसदी लोगों का मानना है कि इराक पर जंग थोपना अमेरिका की सबसे बड़ी भूल थी। मीडिया में आई रिपोर्टों पर अगर गौर करें तो खुद अमेरिका के वर्तमान राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा इस जंग के फैसले को सही नहीं मानते हैं। उन्हें यह समझदारी भरा फैसला नहीं लगता। ऐसे में इस जंग का शिकार हुए लोगों के घाव 10 साल बाद भी कितने हरे होंगे इसका अंदाज़ा बखूबी लगाया जा सकता है। इन 10 सालों के दरम्यान सिर्फ एक देश तबाह हुआ बल्कि लाखों जिंदगियां तबाह हो गईं यों को शारीरिक और मानसिक तौर पर ऐसे ख्म मिले जो आज तक भर नहीं पाए हैं। जंग में जान-माल का कितना नुकसान हुआ, इस बारे में अलग-अलग अंदाजा लगाया जाता रहा है। अमेरिका और सहयोगी देशों ने अफवाहों के आधार पर इराक को बर्बादी की ओर ढकेल दिया। वैश्विक आलोचना और संयुक्त राष्ट्र के मना करने के बाद भी वहां मार्च, 2003 में दो लाख सैनिक झोंक दिए गए और बड़े पैमाने पर हवाई हमले किए गए।

     एक स्टडी पर अगर नज़र डालें तो  इराक जंग में करीब डेढ़ लाख लोगों के मरने और खरबों रुपये के नुकसान की बात कही गई है। जिनमें 4,475 अमेरिकी सैनिकों ने जान गंवाई थी, जबकि 32 हजार से ज्यादा सैनिक घायल हुए थे। अमेरिका को इस जंग में 810 अरब डॉलर यानी  करीब  44 लाख करोड़ रुपये  का नुकसान हुआ था और एक  लाख  16 हजार से ज्यादा  इराकी  नागरिक मारे गए  थे। इराक युद्ध से सिर्फ लोग ही नहीं मरे बल्कि यों जिंदगी हमेशा के लिए नरक बन गई। रिपोर्ट में कहा गया कि इस युद्ध ने कई इराकी नागरिकों को बुरी तरह घायल कर दिया और कई बीमार हो गए। इराक की स्वास्थ्य सेवा को बहुत नुकसान पहुंचा और 50 लाख से ज्यादा लोग पलायन कर गए।  रिसर्च में ये भी कहा गया है कि अमेरिका ने युद्ध में जो पैसे झोकें उसका इस्तेमाल स्वास्थ्य सुधारने संबंधी घरेलू और वैश्विक कई कार्यक्रमों में किया जा सकता था। अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति ने अपनी करनी की माफी भी मांगी। इस जंग का आगाज़ जहां अमेरिका द्धारा चलाई गई पहली गोली से हुआ तो इसका अंजाम भी आखिर में एक इराकी पत्रकार द्वारा बुश पर जूता मारने से हुआ। बड़ा सवाल अभी भी बना हुआ है कि क्या अमेरिकी आक्रमण के 10 साल बाद इराक की आम जनता सामान्य जीवन की ओर लौट पाई है ?

     इराक युद्ध के आठ साल बाद 2011 में अमेरिका ने इराक को छोड़ने की शुरुआत की थी और रिकॉर्ड के मुताबिक़ अब उसकी सेना इराक़ छोड़ चुकी है लेकिन अब भी इराक़ में हिंसा जारी है और हर महीने औसतन 300 लोग मारे जाते हैं। इराक़ को आत्मघाती धमाकों ने पिछले दशक में एक नई पहचान दी और साथ में आतंकियों को एक ऐसा साबित हुआ हथियार जो दहशत में कई गुणा इज़ाफ़ा करता है। जिस मुल्क में पहले शिया और सुन्नी शांति के माहौल में रहते आए हैं, वहां यह दोनों समुदाय एक दूसरे को शक की निगाह से देखते हैं। शिया और सुन्नी इलाक़े पहले भी थे लेकिन अब उन्हें इन्हीं नाम से पहचाना जाता है। इराक़ का समाज टूट चुका है। इराक जंग इन इराक़ियों के लिए ऐसी नासूर साबित हुई कि आज इराक में बच्चे कैंसर दूसरी बीमारियों से ग्रस्त हैं। कई लाख महिलाएं विधवा हैं तो कई लाख बच्चे यतीम हैं। लोगों के पास रोज़गार नहीं है, जिनके पास है भी वो खुश नहीं हैं क्योंकि देश के हालात अबतक कुछ ऐसे हैं जिनके सामान्य होने में शायद काफी लंबा अरसा लगेगा। जंग से पहले दुनियाभर से लाखों शिया श्रद्धालु इराक आते थे। इन दस सालों में इसमें भी बेइंतेहा कमी आई है। वहां के बाशिंदों को सीधा नफा पहुंचाती आई ट्रेवल एंड टूरिज़म इंडस्ट्री आज खात्मे के दहाने पर खड़ी है। भले ही अमेरिकी फौज वहां से 2011 में वापस आ गई हो लेकिन तेल का ज़खीरा अब भी अमेरिका के कब्ज़े में है। इन सुलगते सवालों के बीच एक बड़ा सवाल अब भी बना हुआ है कि क्या बुश के इराकियों से माफी मांगने पर उन्हें माफ कर दिया गया है। क्या सद्दाम हुसैन को फांसी पर चढ़ाना ही अमेरिका का असल मक़सद था या फिर दुनिया को अपनी ताक़त का प्रदर्शन दिखाना उद्देश्य था। ऐसे में एक उससे भी बड़ा सवाल ये है कि अमेरिका कहीं किसी दूसरे मुल्क के साथ जंग की तैयारी तो नहीं कर रहा क्योंकि इराक़ पर हुए हमले के बाद अब अमेरिका की हर जंग को संदेह की नज़र से ही देखा जाएगा। लीबिया और सीरिया में विद्रोहियों को अमेरिकी मदद से दुनिया परिचित है, अब लोकतंत्र, आतंकवाद और भारी तबाही वाले हथियारों की आड़ में होने वाली जंग का पूरी दुनिया में विरोध हो रहा है।

Tuesday, 17 July 2012

दरगाह के बहाने

हाल ही में परिवार के साथ श्रीनगर के बीचों-बीच स्थित हज़रत बल दरगाह के दर्शन के लिये पहुंचा। इस बार मक़सद दरगाह की ज़ियारत था इसलिए यहां आने से पहले मेरे ज़हन में कोई सवाल नहीं था। श्रीनगर एयरपोर्ट उतरते ही होटल पहुंचने के बाद निकल पड़े दरगाह की ज़ियारत के लिये। दरगाह के गेट पर दाना चुग रहे सैकड़ों कबूतर इस बात की गवाही दे रहे थे कि घाटी में सब कुछ शांत है। मस्जिद के गेट पर खड़े सुरक्षाबलों ने हमारी तलाशी ली और फिर मस्जिद में जाने दिया। आलीशान मस्जिद का माहौल एक रूहानी सुकून का ऐहसास दिला रहा था। फिर मेरे मन में सवाल आया कि कहीं दरगाह हज़रत बल पर मेरा आना कश्मीर को फिर से जानने का बहाना तो नहीं। अगले दिन हम पहलगाम की यात्रा पर निकल पड़े। गाड़ी से उतरे तो घोड़ों पर बैठकर वादियों का खूबसूरत नज़ारा लिया। वादियों का दीदार करके जब हम वापस नीचे पहुंचे तो मालूम हुआ कि वहां तैनात सीआरपीएफ़ के जवानों ने किसी बात पर सैकड़ों गाड़ियों के शीशे तोड़ दिऐ और फिर ग़ुस्साई भीड़ ने पत्थरबाज़ी शुरू कर दी। हालात खराब होते देख हम वहां से वापस लौट आए। समझ नहीं आ रह था कि आख़िर मामला क्या है। हमारे साथ मौजूद स्थानीय ड्राइवर ने बताया कि यहां अक्सर ऐसा होता रहता है, उसकी ये बात कुछ अजीब सी लगी लेकिन वहां से सुरक्षित निकलना प्राथमिकता थी। पहलगाम और वहां हुआ हंगामा पीछे छूट चुका था लेकिन उसकी वजह जानने को लेकर बेसब्री बढ़ती जा रही थी। लौटते हुए रास्ते में अमरनाथ में बाबा बर्फ़ानी के दर्शन के लिये जा रहे बड़ी तादाद में श्रद्धालु नज़र आए। उनकी सुरक्षा हमेशा से राज्य और केंद्र सरकार के लिये चुनौती रही है इसलिये चप्पे-चप्पे पर यहां तक कि खेत खलिहानों में भी सीआरपीएफ और सीमा सुरक्षा बल के जवान मौजूद थे। कभी-कभी तो ऐसा महसूस हुआ मानो घाटी में बाशिंदों की आवाजाही कम और सुरक्षाकर्मियों की गहमागहमी अधिक हो। जैसे ही कोई वाहन चेकपोस्ट से तेज़ी से गुज़रता बंदूक़धारी जवानों के माथे पर एक शिकन सी उभर आती। जो ज़िम्मेदारी जम्मू-कश्मीर पुलिस के कंधों पर होनी चाहिए थी आज वो ज़िम्मेदारी इन जवानों को निभानी पड़ रही है। पिछले कई बरसों से घाटी में पनप रहे हालात शायद इसकी सबसे बड़ी वजह हैं। राज्य में सशस्त्र बल विशेष अधिनियम को हटाने की मांग लंबे समय से उठती रही है लेकिन सेना के आगे केन्द्र सरकार की अब तक एक नहीं चल पाई है। शहर के कई इलाक़े और दुकानें बंद थीं। बंद की वजह हाल ही में दस्तगीर दरगाह पर लगी आग और उसके बाद पैदा हुए हालात थे। सोचा की जाएं लेकिन मन में बैठा डर और हालात इस बात की क़तई इजाज़त नहीं दे रहे थे। देर शाम थकी हालत में हम अपने आसरे पर पहुंचे तो वहां काम करने वाले लोगों में से एक से हमारी गुफतुगू हुई। एक शख्स ने मुझसे मुक़ातिब होकर पूछा, घूम आए.. मैंने मुस्कुराते हुए सिर हिलाया। अगले दिन सुबह हम सोनमर्ग के लिए रवाना हो गये। रास्ते में कुदरत की खुबसूरती देखकर ख्याल आया कि आखिर इस जन्नत को किसकी नज़र लग गयी जो इसकी पहचान अशांत भूमि के रूप में होने लगी। आखिर कश्मीर पूरी दूनिया को शांति व सहअस्तित्व का पाठ पढ़ाने में क्यों नाकाम हो गया। अगर ऐसा नहीं है तो जहांगीर ये क्यों कहता कि, गर फिरदौस बर रुए ज़मीं अस्त, हमीं अस्तु, हमीं अस्तु, हमी अस्तु। यानी अगर धरती पर कहीं जन्नत है, तो यही है, यही है, यही है। कश्मीर में बह रही नदियां और उनके प्रवाह, डल जैसी झीलें, अखरोट और चिनार के पेड़, वहां की अनमोल विरासत हैं जिनका बेहतरीन प्रतीक है निशात, शालीमार बाग़ और यादें संजोया परी महल। लोगों की मज़बूती और विनम्रता सम्मोहक विशेषताओं को और खास बनाती है। वे अपने आत्मसम्मान में दर्द को और दर्द में आत्मसम्मान को सहजना जान गये हैं। कश्मीर विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले छात्रों से जब मेरी मुलाक़ात हुई तो उन छात्रों के फौलादी इरादों को देखकर मैं हैरान रह गया। वे अतीत की जकड़न में कुछ पल के लिए भी बंधे नहीं रहना चाहते। वे अपनी समस्याओं का समाधान चाहते हैं, जो सियासत से दूर हो, जो मुल्क और महादेश से परे हो। वे आशावादी भी हैं और यथार्थवादी भी। अब उनका भविष्य ही उनके लिए सबकुछ है।

Sunday, 25 March 2012





लोकतंत्र की कसौटी

सैयद अली अख्तर 

भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है और यहां लोकतंत्र की जड़ें काफी गहरी हैं। लेकिन कई बार कुछ घटनाओं के चलते यहां व्यवस्था कठघरे में खड़ी दिखती है। सभी जानते हैं कि हमारा देश आतंकवाद की समस्या से जूझ रहा है। हम सबको इस लड़ाई में सहयोग करना चाहिए। लेकिन कई ऐसी घटनाएं सामने आ चुकी हैं जिसमें केवल शक की बुनियाद पर कुछ लोगों को आतंकवादी घोषित कर दिया गया और उन्हें तब तक कैद और प्रताड़ना के बीच अपना वक्त काटना पड़ा, जब तक कुछ अदालतों ने उन्हें निर्दोष नहीं घोषित कर दिया। पिछले दिनों दिल्ली की एक आतंकी वारदात के बाद जिस तरह वरिष्ठ पत्रकार मोहम्मद अहमद काजमी पर आरोप लगे, उससे एक बार फिर यह आशंका जाहिर की जा रही है कि क्या हमारी व्यवस्था केवल शक के आधार पर काम करती है। मामले को आतंकवाद से जुड़ा देख कर इंसानियत की लड़ाई लड़ने का दावा करने वाले लोग भी चुप रह गए।
इसमें कोई शक नहीं कि आतंकी घटनाओं को अंजाम देने वाले वास्तविक दोषियों को सजा मिलनी चाहिए, लेकिन आखिर ऐसा क्यों है कि हमारी जांच एजेंसियां किसी भी घटना को रोक पाने के बजाय विदेशी जांच एजेंसियों के दबाव में आकर इधर-उधर हाथ-पैर मारने लगती हैं। हर बार जब कोई आतंकवादी घटना घटती है तो किसी न किसी आतंकवादी संगठन का नाम जरूर आता है। इजराइली राजनयिक की गाड़ी पर हुए हमले के तार ईरान से जोड़ कर जरूर देखे जा रहे हैं, लेकिन इस बार किसी आतंकवादी संगठन का नाम सामने नहीं आया। सवाल है कि इजराइल द्वारा ईरान पर बनाया जा रहा यह दबाव कहीं अमेरिकी-इजराइल नीति का हिस्सा तो नहीं! एक मामला सुलझ भी नहीं पाता कि दूसरी घटना घट जाती है और हमारी जांच एजेंसियां उसके तार जोड़ने में लग जाती हैं। क्या काजमी भी उसी व्यवस्था के शिकार हुए जिसमें किसी भी आतंकी घटना के बाद शक के घेरे में कोई मुसलमान ही आता है?
जांच एजेंसियां जांच करें, इसमें किसी को एतराज नहीं होना चाहिए। लेकिन जांच को भटका कर किसी को कसूरवार बताने का रिवाज जम्हूरी हिंदुस्तान के लिए अच्छा नहीं है। काजमी एक स्वतंत्र पत्रकार रहे हैं, इसके बावजूद उनकी रिपोर्टिंग में वह धार देखी गई जो अमूमन दुनिया के बड़े मीडिया समूहों में भी नहीं देखा जाता है। तो क्या आज उन्हें अमेरिका और इजराइल की नीतियों के खिलाफ आवाज उठाने की कीमत चुकानी पड़ रही है? मुझे नहीं मालूम कि मोहम्मद अहमद काजमी के साथ क्या होगा, लेकिन इतना जरूर पता है कि ऐसे लोग बेगुनाह साबित हो जाने के बाद भी संदेह की नजर से देखे जाते हैं। अपने पर लगे दाग को यह मिटाने की कोशिश भी करें, तो वे साफ  नहीं होते। पूरी जिंदगी समाज के ताने को सहना एक अलग यातना है।
एक पत्रकार जो भारतीय लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का प्रतिनिधित्व करता आया हो, जो पत्रकार की हैसियत से दूसरों से प्रश्न करता आया हो, आज वह खुद सवालों के घेरे में है। जब जांच एजेंसियां उनसे जवाब-तलब कर रही होंगी तो उस वक्त हमारा लोकतंत्र चुपचाप खड़ा अपने कुछ सवालों के बारे में सोच रहा होगा। इस सबके बीच भारत और ईरान के रिश्तों में अगर दरार पड़ती तो उसे एक स्वाभाविक घटना विकास के रूप में देखा जाना चाहिए। कुछ बाहरी ताकतें हैं जो चाहती हैं कि विकासशील राष्ट्रों के बीच फूट डाल कर उन्हें विकसित होने से रोकें। जरूरत इस बात की है कि उनकी मंशा को समझते हुए भारत और ईरान के बीच पुराना विश्वास बहाल रखा जाए।

Friday, 4 November 2011

Need of Right to Employment Bill

Syed. Ali Akhtar

India has more than sixty five per cent youth population. But question arises, whether India is really looking young? Is India really shining? How to keep India Shining? Many questions come into my mind regarding the future of Indian youth who are facing lot of problems. A large number of educated people in the country are unemployed. Young people are a major human resource for development of any country, key agents for social change, driving force for economic development and technological innovation also.

After taking Professional education, when they are not getting job they commit suicide. Employment is behind the surge in number of students committing suicide. After taking admission in Professional Courses their real expectations regarding job has become high.

National Crime Records Bureau, recently released the data which shows that how suicide cases increased by 26% from 2006 to 2010, in metropolitan cities like Bangalore, Delhi and Mumbai having most victims in that order. While 5,857 students suicidals were reported in 2006, the figure rosed to 7,379 in 2010. It means, 20 students killed themselves everyday in year 2010.

Today, there is a greater link between employability and higher education. We are living in a democratic country and still we are facing such problems. Why we are not raising voice. If our government is able to implement, Right to Education, Right to Information, Why not introducing, Right to Employment Bill. Why Is it not be our fundamental right ?

The Education System in India as already pointed out is not very sound. Our Human Resource & Development Minister, Mr.Kapil Sibbal is trying to change the education system in it’s own way. He has taken several decisions in changing the system, but he has failed . The expansion of higher education has been completely unplanned and chaotic. Educated unemployment on this scale has made investment in human resources unproductive. Here is a need of reforms in the policies regarding Education and Employment.

It is a big irony that the best qualified among the educated people migrate to developed western countries for employment. Question arises why they migrate ? Answer is simple , they are not getting good opportunities in India. Their behavior, though justified from their own angle, results in a heavy loss to the society.

Now the time has come that the government should seriously think about Right to Employment Bill, which can ensure hundred percent employment guarantee and eradicate poverty which will make India really a problem free and prosperous Country.